गंगा भक्ति आश्रम में गूंजा मानव जीवन की सार्थकता का संदेश
सत्संग से जागता है विवेक, सेवा और परोपकार से सार्थक होता है जीवन
हरिद्वार (कमल शर्मा)। खड़खड़ी स्थित प्रसिद्ध तपोस्थली गंगा भक्ति आश्रम में प्रातः स्मरणीय ज्ञान, वैराग्य एवं त्याग की साक्षात मूर्ति परमात्मा स्वरूप प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री महंत कमलेशानंद सरस्वती जी महाराज ने भक्तजनों को अपने पावन विचारों से लाभान्वित किया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है, इसलिए इसे केवल सांसारिक मोह-माया में उलझकर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
महंत कमलेशानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि पुण्य कर्म, भजन-सत्संग और प्रभु का निरंतर स्मरण ही मनुष्य को भवसागर से पार लगाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सत्संग केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली आध्यात्मिक पाठशाला है। सत्संग से मनुष्य के भीतर विवेक, सद्भाव और आत्मचिंतन का भाव जागृत होता है तथा वह सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में सेवा, परोपकार, धर्म और सद्कर्मों को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। केवल अपने लिए जीना जीवन की पूर्णता नहीं है, बल्कि जरूरतमंदों के दुख-दर्द को समझकर उनकी सहायता करना ही मानवता का वास्तविक धर्म है। भगवान का नाम स्मरण करते हुए यदि मनुष्य किसी जरूरतमंद के जीवन में मुस्कान ला सके, तो इससे बड़ी पूजा और कोई नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में मानसिक शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में भजन, सत्संग और आध्यात्मिक चिंतन ही मन को स्थिरता प्रदान कर सकते हैं। जब हृदय में भक्ति, करुणा और सद्भाव का भाव जागृत होता है, तो व्यक्ति के विचारों के साथ-साथ उसका पूरा जीवन सकारात्मक दिशा में बदलने लगता है।
गुरु महाराज ने भक्तजनों को संदेश दिया कि जीवन कितना लंबा है, यह हमारे हाथ में नहीं, लेकिन जीवन को कितना सार्थक बनाना है, यह हमारे कर्म तय करते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय प्रभु के स्मरण, सत्संग और समाजसेवा के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
इस अवसर पर आश्रम में उपस्थित भक्तजनों ने गुरु महाराज के पावन विचारों को श्रद्धापूर्वक सुना। भजन-सत्संग से आश्रम का वातावरण भक्तिमय हो उठा और श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की।
मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य देन, इसे भजन-सत्संग और सेवा में लगाएं: महंत कमलेशानंद सरस्वती













