अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए उठी आवाज, उत्तराखंड में अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू करने की मांग



बागेश्वर के अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परिहार की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद मामला गरमाया, हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने राज्य मानवाधिकार आयोग में दाखिल की याचिका
हरिद्वार (कमल शर्मा)। उत्तराखंड में अधिवक्ताओं के विरुद्ध लगातार बढ़ती हिंसा, जानलेवा हमलों, हत्या, अपहरण, धमकी और उत्पीड़न की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू करने की मांग तेज हो गई है। इसी कड़ी में हरिद्वार के अधिवक्ताओं एवं विधि के विद्यार्थियों ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाते हुए एक महत्वपूर्ण याचिका दाखिल की है। याचिका के माध्यम से राज्य सरकार को उत्तराखंड अधिवक्ता संरक्षण विधेयक तैयार कर विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
इस मांग के पीछे बागेश्वर के अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परिहार का मामला भी प्रमुख आधार बना है। जानकारी के अनुसार, धीरेंद्र सिंह परिहार 17 अक्टूबर 2026 से लापता थे। उनकी माता श्रीमती नंदी परिहार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए अपने पुत्र की तलाश की गुहार लगाई थी। वहीं, बागेश्वर के अधिवक्ताओं, व्यापारियों एवं स्थानीय नागरिकों ने प्रदर्शन और चक्का जाम कर उनकी शीघ्र तलाश तथा मामले का खुलासा करने की मांग की थी। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से 3 नवंबर 2026 को उनका शव नदी गांव रोड स्थित दिगर पाटल क्षेत्र, बागेश्वर में बरामद हुआ। इस घटना ने अधिवक्ताओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन अधिवक्ताओं ने दाखिल की याचिका
हरिद्वार के अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदौरिया एडवोकेट (पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह), चेतन भदौरिया (एलएलबी अध्ययनरत), शाहनवाज मलिक (एलएलबी अध्ययनरत) तथा श्रीमती रेखा पांडे एडवोकेट ने यह याचिका दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि अधिवक्ता न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करते समय उन्हें कई बार आपराधिक तत्वों, प्रभावशाली व्यक्तियों और असामाजिक तत्वों के दबाव, धमकियों तथा हिंसा का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में अधिवक्ताओं को पुलिस से भी समय पर आवश्यक सुरक्षा एवं सहयोग नहीं मिल पाता।
याचिका में उल्लेख किया गया है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में पैरवी करने, प्रभावशाली व्यक्ति या आपराधिक तत्व के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने, विधिक सलाह देने अथवा अपने मुवक्किल के अधिकारों की रक्षा करने के कारण अधिवक्ताओं को निशाना बनाया जाता है। इतना ही नहीं, कई बार झूठी और मनगढ़ंत शिकायतों के माध्यम से उन्हें मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने का प्रयास भी किया जाता है, ताकि वे अपने कानूनी कर्तव्यों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन न कर सकें।
अधिवक्ताओं की हत्या और संपत्ति पर हमले चिंता का विषय
याचिका में न्यायालय परिसर, चैंबर, कार्यालय, आवास तथा न्यायालय आते-जाते समय अधिवक्ताओं के साथ मारपीट और जानलेवा हमलों की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अधिवक्ताओं की हत्या, अपहरण और गंभीर रूप से घायल किए जाने जैसी घटनाएं कानून व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती हैं। कोटद्वार में एक वरिष्ठ अधिवक्ता की हत्या का मामला भी इस चिंता को और गंभीर बनाता है।
इसके अलावा अधिवक्ताओं के कार्यालय, चैंबर, आवास और वाहनों में तोड़फोड़ एवं आगजनी कर आर्थिक नुकसान पहुंचाने तथा उनके परिवार के सदस्यों को धमकाने की घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की गई है। याचिका के अनुसार, शिकायतों के बावजूद समय पर पुलिस सुरक्षा उपलब्ध न होना और प्रभावी कानूनी कार्रवाई में लापरवाही अधिवक्ता समुदाय में भय का वातावरण पैदा कर रही है।
कर्नाटक, राजस्थान और तेलंगाना की तर्ज पर कानून बनाने की मांग
याचिका में कहा गया है कि कर्नाटक और राजस्थान में वर्ष 2023 तथा तेलंगाना में वर्ष 2026 में अधिवक्ता संरक्षण से संबंधित कानून बनाए जा चुके हैं। ऐसे में उत्तराखंड जैसे पर्वतीय एवं मैदानी भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में भी अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए व्यापक और प्रभावी कानून बनाया जाना बेहद आवश्यक है।
अधिवक्ता संरक्षण कानून में शामिल हों ये प्रमुख प्रावधान
याचिकाकर्ताओं ने प्रस्तावित कानून में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल करने की मांग की है—
अधिवक्ताओं के विरुद्ध हिंसा, मारपीट और जानलेवा हमलों को विशेष अपराध घोषित किया जाए।
अधिवक्ताओं के कार्यालय, चैंबर, आवास, वाहन एवं अन्य चल-अचल संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
पेशेवर कार्यों को रोकने या दबाव बनाने के उद्देश्य से की गई दुर्भावनापूर्ण झूठी शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो तथा शिकायतकर्ता के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया जाए।
खतरे की स्थिति में अधिवक्ताओं को तत्काल पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
हत्या एवं गंभीर आपराधिक घटनाओं की जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी में विशेष जांच व्यवस्था के तहत कराई जाए।
प्रत्येक जनपद में जिला न्यायाधीश अथवा उनके नामित प्रतिनिधि, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिला बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि एवं अन्य उपयुक्त सदस्यों को शामिल करते हुए शिकायत निवारण समिति गठित की जाए।
पीड़ित अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता एवं उचित मुआवजा उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो।
अधिवक्ताओं के परिवार के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
राज्य स्तर पर 24 घंटे संचालित अधिवक्ता सुरक्षा हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल स्थापित किया जाए।
राज्य सरकार को विधेयक तैयार कर विधानसभा में पेश करने के निर्देश देने की मांग
भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट की ओर से याचिका में राज्य सरकार को निर्देशित करने की मांग की गई है कि उत्तराखंड में एक व्यापक एवं प्रभावी अधिवक्ता संरक्षण विधेयक तैयार कर उसे राज्य विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। विधेयक तैयार करते समय कर्नाटक, राजस्थान और तेलंगाना के कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तथा उत्तराखंड की भौगोलिक, सामाजिक और न्यायिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी प्रावधान शामिल किए जाएं।
साथ ही यह भी मांग की गई है कि जब तक अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू नहीं हो जाता, तब तक अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए अंतरिम दिशा-निर्देश जारी किए जाएं और पुलिस प्रशासन को उनकी शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई तथा आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाएं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते, बल्कि न्याय और संविधान के अधिकारों की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि अधिवक्ता ही भय और असुरक्षा के माहौल में काम करने को मजबूर होंगे, तो न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता और आम नागरिकों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी। ऐसे में उत्तराखंड में अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है।

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