गरीबदासी आचार्य पीठ में गूंजा संतों का संदेश, विशाल संत समागम और भंडारे में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब



हरिद्वार (कमल शर्मा)। सुखी नदी स्थित गरीबदासी आचार्य पीठ, हरिद्वार में श्रद्धा, भक्ति और संत परंपरा से ओतप्रोत विशाल संत समागम एवं भंडारे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देशभर से संत-महात्माओं ने पहुंचकर श्रद्धालुओं को धर्म, अध्यात्म, सेवा और सदाचार का संदेश दिया। संत समागम के बाद आयोजित भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
कार्यक्रम का आयोजन कोठी स्वामी दयालदास, छुड़ाणी धाम, जिला झज्जर (हरियाणा) की ओर से किया गया। यह पीठ ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 अवधूत शिरोमणि स्वामी भक्तराम जी महाराज एवं ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 अवधूत स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी महाराज की संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है।


इस अवसर पर महामंडलेश्वर अवधूत स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी महाराज, अध्यक्ष अखिल भारतीय संत समिति हरियाणा प्रदेश एवं पीठाधीश्वर श्री गरीबदासीय आचार्य पीठ, कोठी स्वामी दयालुदास, मनोकामना पूर्ण सतगुरु संत मंदिर, छुड़ाणी धाम ने कहा कि संत समागम भारतीय सनातन परंपरा की जीवंत धरोहर हैं। संतों का सानिध्य मनुष्य के जीवन को संस्कार, सेवा और सदाचार की दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में समाज को आध्यात्मिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। संतों की वाणी और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर युवा पीढ़ी को धर्म, संस्कृति, सेवा और राष्ट्रहित के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि भंडारा केवल भोजन कराने की परंपरा नहीं, बल्कि समानता, सेवा और मानवता का संदेश देने वाला धार्मिक आयोजन है।
महामंडलेश्वर स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी महाराज ने कहा कि संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है। उन्होंने समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा, सद्भाव और जरूरतमंदों की सेवा को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
संत समागम में उपस्थित संत-महात्माओं ने भी श्रद्धालुओं को आशीर्वचन प्रदान किए। इस दौरान आश्रम परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया और विशाल भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।
आयोजकों ने कहा कि गरीबदासी आचार्य पीठ की संत परंपरा के माध्यम से धर्म, अध्यात्म और मानव सेवा के कार्य निरंतर आगे बढ़ाए जाते रहेंगे। आयोजन ने हरिद्वार की संत परंपरा और सामाजिक समरसता को और मजबूती प्रदान की।

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