परिक्रमा साहित्यिक मंच द्वारा आयोजित की गई की कवि गोष्ठी


                                            16.08.2026
         परिक्रमा साहित्यिक मंच ने की कवि गोष्ठी
       गर माता के काम न आया तो जीवन बेकार है
         वतन मेरा ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद रहे……
हरिद्वार। परिक्रमा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की और से भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शिवालिक नगर स्थित सामुदायिक केन्द्र में एक भव्य कवि गोष्ठी का आयोजन‌‌ किया गया, जिसके अन्तर्गत अनके अनुभवी तथा युवा कवियों ने अपनी ओजस्वी रचनाओं द्वारा भारत के राष्ट्र तथा उसकी स्वतंत्रता के लिये प्राणों का उत्सर्ग करने वाले वीर सपूतों को नमन किया।‌ गोष्ठी के दौरान ही कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे काव्य व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान पं ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ की पुस्तक ‘सत्यनारायण कथा’ का विमोचन‌ भी किया गया।
       माँ वीणापाणि के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलन, पुष्प तथा माल्यार्पण कर वाणी वंदना के साथ आरम्भ हुई इस गोष्ठी में डाॅ० मीरा भारद्वाज ने ‘तिरंगा साथ है अपने घड़ी कितनी सुहानी है’, वरिष्ठ कवि और पत्रकार बृजेन्द्र हर्ष ने ‘जिसके रंगों से झरता अमन उस तिरंगे को शत-शत नमन’, डाॅ० नीता नय्यर ‘निष्ठा’ ने ‘इस धारा के लिए इस गगन के लिए, जान हाजिर है अब तो वतन के लिए’ तथा अभिनंदन गुप्ता ‘अभि रसमय’ ने उठ खड़े हो मेरे देश के नौजवानों हर घर तिरंगा हम फहराएंगे’ के साथ भारत की आज़ादी के सबल प्रतीक तिरंगे राष्ट्र ध्वज का महिमामंडन किया।
       चेतना पथ संपादक व गीतकार अरुण कुमार पाठक ने ‘गीदड़ भभकी और धमकियाँ, हो गयीं अब बीती बातें, जाओ परमाणु ले आओ, अब कर लो तुम सीधी बातें’ कहकर दुश्मन को सीधी चुनौती दी, तो कुंअर पाल सिंह ‘धवल’ ने राष्ट्र की आराधना ही ईष्ट की आराधना, कंचन प्रभा गौतम ने ‘फना हो गर ये जीवन तो वतन तेरे लिये, वतन मेरा ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद रहे’, मदन सिंह यादव ने ‘गर माता के काम न आया तो जीवन बेकार है, भारत माता के चरणों में अपना घर संसार है’, आशा साहनी ने ‘स्वतंत्रता के भाव को निहारती माँ भारती’, कुसुमाकर मुरलीधर पंत ने ‘रूठना न देश मेरे, बलिदान चढ़ाकर आया हूँ’ तथा राजकुमारी राजेश्वरी ने ‘जिनके अहसानों का हर इक भारतवासी पर ऋण है’ कह कर मातृभूमि व शहीदों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
      इमरान बदायूँनी ने ‘बहुत बिखरा हुआ चमन हमारा है चले आओ’ कह कर देश के वर्तमान हालातों पर चिंता व्यक्त की।
गीतकार सुभाष मलिक क्रांति का बीज बोया, बैठ के फिरंगी रोया मंगल पांडे जी की तरुणाई को नमन है’ के साथ वीरों की कुर्बानियों को याद किया। मदन सिंह यादव के साथ गोष्ठी का संचालन कर रहे परिक्रमा सचिव शशिरंजन समदर्शी ने चलो क्षितिज के पार वहाँ से प्रेम गीत ले आये हैं’ के माध्यम से देशप्रेम दर्शाया।
      अभिषेक ‘अक्स आनन्द’ ने ‘तुझे तो किसी ने जना है, कल तेरे घर बेटियाँ होंगी तथा सोनेश्वर कुमार ‘सोना’ ने ‘सूटकेस में बंद अंधेरी राहों का वह मौन रुदन’ के साथ देश में महिलाओं व युवतियों के साथ होने वाले अत्याचारों‌ की ओर ध्यान खींचा। अमित कुमार ‘मीत’ ने ‘पत्थर की मूर्ति हूँ छू ले जरा, प्राण डाल मुझमें, जीवन दे नया’ के साथ देशवासियों में उमंग और उल्लास का आह्वान किया।गोष्ठी में पं. ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’, अरुणा वशिष्ठ, प्रेम शंकर शर्मा ‘प्रेमी’, महेश चन्द्र काला, चित्रा शर्मा ‘वीथिका’, छंद विशेषज्ञ साधुराम ‘पल्लव’, देवेन्द्र मिश्र तथा मानस पंत ने भी ओजस्वी काव्य पाठ कर देशप्रेम के रंग बिखेरे और ख़ूब तालियाँ बटोरीं।

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