भागवत कथा के अंतिम दिन उमड़ा आस्था का सैलाब, संत तारा देवी ने कहा—निष्काम भक्ति से ही मिलता है प्रभु का सानिध्य


सुदामा की भक्ति और परीक्षित के मोक्ष ने भाव-विभोर किया श्रद्धालुओं को

फलोदी (राजस्थान)। श्राद्ध पक्ष के पावन अवसर पर पितरों की शांति, सर्वसंकट निवारण एवं विश्वकल्याण की भावना से ईश्वर बाग स्थित इच्छापूर्ण काल भैरवनाथ जी मंदिर प्रांगण में परम श्रद्धेय गुरु मां संत तारादेवी जी के श्रीमुख से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के सातवें एवं अंतिम दिन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा के अंतिम दिवस भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त सुदामा चरित्र तथा राजा परीक्षित के मोक्ष (मुक्ति) का मार्मिक प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
कथा व्यास संत तारा देवी जी ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि सच्ची भक्ति में धन-दौलत अथवा सांसारिक वैभव का कोई महत्व नहीं होता। भगवान अपने भक्त की भावना देखते हैं। सुदामा के पास देने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन उनकी निष्कपट भक्ति और प्रेम ने भगवान श्रीकृष्ण को उनका ऋणी बना दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में अहंकार, लोभ और मोह का त्याग कर सत्य, सेवा, प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलना चाहिए। यही भागवत का वास्तविक संदेश है।
राजा परीक्षित के मोक्ष प्रसंग के माध्यम से संत तारा देवी ने कहा कि मनुष्य का जीवन अनमोल है और इसका प्रत्येक क्षण प्रभु स्मरण तथा सत्कर्मों में लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा का द्वार है। जो व्यक्ति अंत समय में भी प्रभु का स्मरण करता है और जीवनभर धर्म, सत्य तथा सदाचार के मार्ग पर चलता है, वह भय से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है।
कार्यक्रम में उपस्थित नवरतन दवे ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल कथा सुनने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक ग्रंथ है। सुदामा चरित्र हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, व्यक्ति को अपनी निष्ठा, संस्कार और भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के भौतिकतावादी दौर में भागवत जैसे धार्मिक आयोजन समाज को संस्कार, सद्भाव और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
पूर्णा बोहरा ने कहा कि भागवत कथा का श्रवण मन को शांति देने के साथ-साथ जीवन में सकारात्मक सोच और अच्छे कर्मों की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि सुदामा की सरलता, कृष्ण की मित्रता और परीक्षित की प्रभु के प्रति शरणागति हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है। हमें कथा के संदेश को केवल सुनना नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारना चाहिए।
कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों के साथ वातावरण को भक्तिमय कर दिया। आयोजन के दौरान पितरों की शांति, परिवार एवं समाज की सुख-समृद्धि तथा विश्वकल्याण की कामना की गई। श्रद्धालुओं ने संत तारा देवी जी से आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीमद्भागवत कथा के आध्यात्मिक संदेश को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
भागवत कथा का अंतिम संदेश यही रहा—धन और वैभव क्षणभंगुर हैं, लेकिन भक्ति, संस्कार, सद्कर्म और प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम मनुष्य को जीवन की वास्तविक शांति और मुक्ति की ओर ले जाते है

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