अमेरिकन आश्रम विवाद में नया मोड़: कांवड़ यात्रा के दौरान चारदीवारी के आरोप पर ट्रस्ट ने उठाए सवाल, बोले—बिना जांच लांछन लगाना मानहानि की श्रेणी में आता है तो जवाब कौन देगा?

हरिद्वार। भूपतवाला स्थित ऐतिहासिक अमेरिकन आश्रम/स्वामी देवानंद ट्रस्ट की भूमि को लेकर चल रहा विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दस्तावेजों और तथ्यों की जांच का विषय बनता जा रहा है। एक पक्ष जहां करोड़ों की धार्मिक संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने, अवैध निर्माण और कब्जे की कोशिश के आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने इन आरोपों को एकतरफा, भ्रामक और संस्था तथा उससे जुड़े व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।
कांवड़ यात्रा के दौरान एक रात में चारदीवारी का आरोप—ट्रस्ट ने उठाए सवाल
विवाद के बीच यह आरोप भी सामने आया कि कांवड़ यात्रा के दौरान रातों-रात आश्रम की भूमि पर चारदीवारी अथवा स्लीपर लगाए गए। इस पर ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में ऐसी कोई गतिविधि हुई थी तो प्रबंधन स्तर पर तत्काल इसकी शिकायत की गई थी।


उनका कहना है कि 11 तारीख को जल होने के कारण संबंधित अधिकारी अपने कार्यालयों में उपलब्ध नहीं थे और 12 तारीख को ही संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज करा दी गई थी। ऐसे में यह कहना कि आश्रम प्रबंधन या संस्था से जुड़े लोग पूरे घटनाक्रम में मूकदर्शक बने रहे, तथ्यात्मक रूप से जांच का विषय है।
ट्रस्ट से जुड़े लोगों का सवाल है कि जब कथित अतिक्रमण अथवा कब्जे की कोशिश के तत्काल बाद शिकायत प्रशासन के समक्ष रख दी गई थी, तो फिर संस्था के प्रबंधक, ट्रस्ट पदाधिकारियों अथवा उससे जुड़े लोगों पर सीधे उंगली उठाने का आधार क्या है?
‘पहले दस्तावेज देखे जाएं, फिर आरोप लगाए जाएं’
ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था, उसके प्रबंधक अथवा पदाधिकारियों पर सार्वजनिक रूप से गंभीर आरोप लगाने से पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि किसी भूमि पर अवैध कब्जे की कोशिश हुई है तो उसकी शिकायत प्रशासन से करना संस्था की जिम्मेदारी है और यही कार्रवाई यहां भी किए जाने का दावा किया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब घटनाक्रम की शिकायत प्रशासन को समय रहते दे दी गई थी, तो उसके बावजूद सोशल मीडिया पर संस्था और उससे जुड़े लोगों को कटघरे में खड़ा करना क्या उचित है?
उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ जानबूझकर गलत तथ्य प्रसारित किए जाते हैं और उससे उसकी सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है तो यह केवल सामान्य आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं रह जाता, बल्कि मानहानि के कानूनी पहलू की भी जांच आवश्यक हो जाती है।
‘किसकी जमीन, किसका अधिकार और किसने किया निर्माण’—जांच से सामने आए सच्चाई
मामले में दोनों पक्षों के दावों के बीच अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन के वास्तविक स्वामित्व, ट्रस्ट की वैधानिक स्थिति, पूर्व न्यायालयीन प्रकरणों, भूमि के उपयोग तथा वर्तमान निर्माण से संबंधित दस्तावेजों का है।
ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति ने भूमि पर कब्जे अथवा निर्माण की कोशिश की है तो प्रशासन को राजस्व अभिलेख, ट्रस्ट दस्तावेज, न्यायालयीन आदेश और मौके की स्थिति की जांच करनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि भूमि पर वास्तविक अधिकार किसका है और किसने किस आधार पर निर्माण अथवा चारदीवारी की।
सामाजिक सेवा करने वाले व्यक्ति की छवि खराब करने का भी आरोप
दूसरी ओर ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने उस व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदू शरणार्थियों के लिए भूमि दान, गौसेवा, मंदिर निर्माण, आपदा राहत और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यों में योगदान दिया है। उनका दावा है कि हरिद्वार में ली गई भूमि का उपयोग भी गौसेवा, चारा एवं भोजन की व्यवस्था के लिए किया जा रहा है।
उनका कहना है कि ऐसे व्यक्ति या संस्था पर बिना पूरी जानकारी हासिल किए सोशल मीडिया पर गंभीर आरोप लगाना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे उनकी वर्षों की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंच सकता है।
पुराने विवादों की कड़ियां जोड़ने से पहले हो तथ्यात्मक जांच
मामले में पूर्व में आश्रम की भूमि से जुड़े विवादों और कुछ व्यक्तियों की भूमिका का भी उल्लेख किया जा रहा है। ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने मांग की है कि यदि पुराने विवाद और वर्तमान घटनाक्रम के बीच कोई संबंध होने का दावा किया जा रहा है तो उसकी भी दस्तावेजों के आधार पर जांच होनी चाहिए। किसी व्यक्ति को पुराने विवाद से जोड़कर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करने से पहले प्रमाण सामने रखना आवश्यक है।
प्रशासन करे निष्पक्ष जांच, दूध का दूध और पानी का पानी हो
संत समाज एवं क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि जिलाधिकारी हरिद्वार, धर्मस्व विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराएं। जांच में आश्रम की भूमि के स्वामित्व, ट्रस्ट की स्थिति, कथित चारदीवारी, निर्माण, पूर्व न्यायालयीन प्रकरण, शिकायतों की तारीख और संबंधित दस्तावेजों को शामिल किया जाए।
साथ ही यह भी मांग की गई है कि यदि किसी पक्ष ने गलत तथ्य प्रस्तुत कर संस्था अथवा किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
अमेरिकन आश्रम की करोड़ों की संपत्ति से जुड़ा विवाद अब केवल जमीन का मामला नहीं रह गया है। इसमें धार्मिक धरोहर, ट्रस्ट की जिम्मेदारी, कथित अतिक्रमण, प्रशासनिक शिकायतों और सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे आरोपों की विश्वसनीयता—सभी सवाल एक साथ सामने आ गए हैं। ऐसे में सबसे जरूरी है कि आरोपों और प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर दस्तावेजों के आधार पर जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आए और ऐतिहासिक धार्मिक संपत्ति की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

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