1924 से 2025 : 101 साल बाद दोहराया मानसून का प्रकोप

👉 आपके अनुसार 1924 और 2025 की बारिश में असली फर्क किसने पैदा किया — प्रकृति की शक्ति या मानव का हस्तक्षेप?

🌧️ 🌊 देहरादून की सहस्त्रधारा घाटी में सितम्बर 2025 की बरसात ने 101 साल पुराने इतिहास को दोहरा दिया।

3 सितम्बर 1924 को जब 24 घंटे में 212 मिमी बारिश दर्ज हुई थी, तब इसे एक असाधारण घटना माना गया। ठीक एक सदी बाद, 16-17 सितम्बर 2025 को सहस्त्रधारा क्षेत्र में 264 मिमी वर्षा ने उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया। सवाल यह उठता है कि जब दोनों बार बादल फटे, बारिश लगभग बराबर हुई, तो नुक़सान 1924 की तुलना में आज इतना बड़ा क्यों हुआ?

📜 इतिहास की बरसात और आज का विनाश

1924 का देहरादून हरा-भरा था। जंगल सघन थे, नदियों के किनारे बस्तियाँ नहीं फैली थीं और शहर की आबादी मात्र पचपन हज़ार के आसपास थी। बारिश से नदियाँ उफनीं, खेत डूबे, मगर बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि दर्ज़ नहीं हुई।
आज का देहरादून बिल्कुल अलग है। आबादी दस लाख से ऊपर है, नदियों के किनारे होटल, रिसॉर्ट और सड़कें बसी हैं, पहाड़ों की ढलानों पर इमारतें खड़ी हैं। वही बारिश, जो तब प्राकृतिक घटना थी, अब आपदा का रूप ले चुकी है।

🔬 विज्ञान की नज़र से

क्लाउडबर्स्ट विज्ञान की भाषा में तब होता है जब बेहद छोटे क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 100 मिमी से ज़्यादा वर्षा हो जाए। सहस्त्रधारा घाटी का भौगोलिक स्वरूप — चारों ओर पहाड़ और बीच में संकरी नदी — ऐसे में पानी के बहाव को और तीव्र बना देता है।
1924 में यह एक दुर्लभ मानसूनी संयोग था। मगर आज जलवायु परिवर्तन ने इस तरह की घटनाओं को अधिक बार और अधिक तीव्र बना दिया है। पिछले सौ वर्षों में धरती का तापमान एक डिग्री से अधिक बढ़ चुका है। वातावरण जितना गर्म होगा, उतनी अधिक नमी वह अपने भीतर समेटेगा और जब वह फटेगा तो बादल का प्रकोप और भी बड़ा होगा। यही कारण है कि समान वर्षा अब कहीं अधिक विनाशकारी बन गई है�

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