अंग्रेजों के दौर के कानूनों को हटाने की मांग, उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग में याचिका दाखिल
हरिद्वार (कमल शर्मा)। भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए कई कानूनों की विरासत आज भी भारतीय कानूनी व्यवस्था में दिखाई देती है। इसी मुद्दे को उठाते हुए हरिद्वार के अधिवक्ताओं एवं कानून के विद्यार्थियों के एक समूह ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून में याचिका दाखिल की है। याचिका में ब्रिटिश काल के कानूनों की समीक्षा कर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप नई कानूनी व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है।
भदोरिया एसोसिएट ग्रुप की ओर से दाखिल इस याचिका में प्रमुख सचिव, गृह विभाग उत्तराखंड शासन, प्रमुख सचिव, संस्कृति विभाग उत्तराखंड शासन तथा पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने आयोग से अनुरोध किया है कि संबंधित विभागों को पुराने कानूनों की समीक्षा करने, आवश्यक बदलाव करने तथा जरूरत के अनुसार नए कानून बनाने के लिए निर्देशित करने पर विचार किया जाए।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि नए कानून तैयार करने की प्रक्रिया में विधि विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से परामर्श लिया जाए। इसके साथ ही गृह विभाग और न्याय विभाग से इस विषय पर उनका पक्ष तथा उपलब्ध कानूनों एवं नीतियों से संबंधित जानकारी प्राप्त करने पर भी विचार करने का अनुरोध किया गया है।
ब्रिटिशकालीन कानूनों की विरासत पर उठाए सवाल
याचिका में भदोरिया एसोसिएट ग्रुप ने तर्क दिया है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी देश की कानूनी व्यवस्था में ब्रिटिश शासन के समय बनाए गए कई कानूनों का प्रभाव बना हुआ है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों, नागरिक अधिकारों और वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कानूनों की व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाया जा सके।
समूह ने अपने पक्ष में ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए भारतीय दंड संहिता, पुलिस अधिनियम, साक्ष्य कानून, भूमि अधिग्रहण कानून, वन कानून और शस्त्र कानून सहित विभिन्न अधिनियमों का उल्लेख किया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इनमें समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, लेकिन पुराने कानूनी ढांचे की समीक्षा और व्यापक सुधार की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
क्रांतिकारियों और धार्मिक संस्थाओं के इतिहास का भी उल्लेख
याचिका में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तथा क्रांतिकारी मंगल पांडे की भूमिका का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को कठोर दमन का सामना करना पड़ा। समूह ने अपने तर्क में मठ-मंदिरों पर नियंत्रण, स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई सजाओं और औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों का भी उल्लेख किया है।
याचिका में ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए विभिन्न कानूनों को तत्कालीन औपनिवेशिक नीतियों के संदर्भ में देखने की आवश्यकता बताई गई है। हालांकि, ब्राह्मणों को सबसे अधिक फांसी दिए जाने, काला पानी की सजा मिलने अथवा गोलियों से मारे जाने से संबंधित दावों की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक अभिलेखों और प्रमाणिक आंकड़ों का परीक्षण आवश्यक है।
स्वतंत्र भारत की जरूरतों के अनुरूप कानून बनाने की मांग
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आजादी का उद्देश्य केवल विदेशी शासन से मुक्ति पाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना भी था, जिसमें कानून जनता के अधिकारों, स्वतंत्रता और न्याय की भावना के अनुरूप हों। इसी दृष्टिकोण से समूह ने पुराने कानूनों की समीक्षा, अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाने और आवश्यकतानुसार नए कानून तैयार करने की मांग उठाई है।
याचिका दाखिल करने वालों में अधिवक्ता अरुण को भदोरिया, अधिवक्ता कमल भदोरिया, अधिवक्ता सुमेधा भदोरिया, अधिवक्ता श्रीमती रेखा पांडे, एलएलबी के विद्यार्थी चेतन भदोरिया और एलएलबी के विद्यार्थी शाहनवाज मलिक शामिल हैं।
अब इस मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग की ओर से की जाने वाली कार्रवाई और संबंधित विभागों का पक्ष महत्वपूर्ण होगा।
भदोरिया एसोसिएट ग्रुप ने उठाया कानूनी व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा, वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप नए कानून बनाने और नागरिक समाज से परामर्श लेने की मांग













