ऋषि च्यवन के वयस्थापन अवलेह, च्यवनप्राश, को मिला आधुनिक विज्ञान का प्रमाण

पतंजलि का च्यवनप्राश पर किया गया शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल Experimental Gerontology में प्रकाशित

पतंजलि के वैज्ञानिकों ने महर्षि च्यवन से सम्बंधित लोक प्रचलित कथा को आधुनिक विज्ञान के साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत कर जीवंत कर दिया है : आचार्य बालकृष्ण

हरिद्वार, 18 जुलाई: पतंजलि के वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व उपलब्धि प्राप्त करते हुए यह पुष्टि की है कि पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश तनाव की परिस्थितियों में कोशिकाओं की रक्षा करता है, मांसपेशियों की कार्यक्षमता को सुचारु रखता है एवं शरीर को दीर्घायु प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल Experimental Gerontology में प्रकाशित यह अध्ययन न केवल पतंजलि की वैज्ञानिक क्षमता का परिचायक है, अपितु आयुर्वेद को वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के समक्ष साक्ष्य-आधारित चिकित्सा प्रणाली के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि प्राचीनकाल में जब महर्षि च्यवन अत्यंत वृद्ध और जर्जर अवस्था में थे, तब उनके लिए एक विशिष्ट “रसायन” तैयार किया गया, जिसके सेवन से महर्षि च्यवन ने पुनः ऊर्जा, स्फूर्ति, स्वास्थ्य और यौवन प्राप्त किया एवं इस रसायन का नाम रखा गया, च्यवनप्राश।
यह कथा केवल भारतीय सनातन परंपरा की एक प्रेरणादायक स्मृति भर नहीं है, अपितु सदियों से करोड़ों भारतीय, च्यवनप्राश को रोग प्रतिरोधक क्षमता, दीर्घायु और संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार मानते आए हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में इसे “रसायन” अर्थात् शरीर, मन और जीवनीशक्ति को पुनर्जीवित करने वाला बताया गया है। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने इसी लोकप्रचलित कथा को आधुनिक विज्ञान के साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत कर जीवंत कर दिया है।
इस अवसर पर पतंजलि के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अनुराग वार्ष्णेय ने इस शोध के बारे में बताते हुए कहा कि यह शोध आयुर्वेद और आधुनिक जीवविज्ञान के संगम का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस शोध में पतंजलि के वैज्ञानिकों ने C. elegans मॉडल जीव का उपयोग किया, जिसकी अनेक जैविक प्रक्रियाएं मनुष्यों से मिलती-जुलती हैं और जिसे विश्वभर में वृद्धावस्था एवं तनाव संबंधी अनुसंधानों के लिए स्वीकार्य मॉडल माना जाता है।
आगे उन्होंने बताया कि इस शोध में च्यवनप्राश के नियमित सेवन से इन जीवों में हीट स्ट्रेस के कारण उत्पन्न होने वाली कोशिकीय क्षति में उल्लेखनीय कमी आई, जिससे इनके जीवनकाल एवं आयु में वृद्धि देखी गई, भोजन ग्रहण करने की क्षमता में वृद्धि हुई एवं मांसपेशियों में गतिशीलता और कार्यक्षमता में सुधार हुआ। शोध से पुष्टि हुई कि च्यवनप्राश में विद्यमान तत्व, शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट एवं सूजनरोधी गुणों से युक्त हैं जो कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में योगदान देते हैं। साथ ही च्यवनप्राश के सेवन से कोशिकाओं के प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को मजबूती मिलती है और तनाव के प्रति अनुकूलन क्षमता में वृद्धि होती है।
आप भी भारत के इस प्राचीन ज्ञान को विज्ञान की भाषा में जीवंत होने के साक्षी बने और इस शोध को नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से पढ़ें!

  1. https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0531556526002081
  2. https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/42401269/
    यह शोध इस तथ्य का भी प्रमाण है कि भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक परंपरा केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, अपितु आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान देने की क्षमता रखती है। महर्षि च्यवन की कथा से प्रारंभ हुई च्यवनप्राश की यह यात्रा आज अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं तक पहुंच चुकी है और वैज्ञानिक प्रमाणों के माध्यम से विश्व को यह संदेश प्रदान कर रही है कि हजारों वर्ष पुराना भारतीय ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक, प्रभावी और भविष्यदर्शी है।

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