22 माह बाद पेंशनरों की मांगों पर शासन का यू-टर्न, 1.50 लाख पेंशनर्स हैरान
समिति बनाकर जांच के बाद अब 8वें वेतन आयोग पर टाली मांगें, कार्मिक एकता मंच ने सीएम से मांगी अधिकारियों की जवाबदेही
देहरादून। उत्तराखण्ड के करीब 1.50 लाख पेंशनरों से जुड़ी महत्वपूर्ण मांगों पर शासन की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पेंशन के राशिकरण की कटौती अवधि कम करने और 65 से 80 वर्ष की आयु के बीच अतिरिक्त पेंशन वृद्धि की मांगों के परीक्षण के लिए समिति गठित करने के पूरे 22 माह बाद उत्तराखण्ड शासन ने इन मांगों को अब 8वें वेतन आयोग की संस्तुतियों पर विचार के लिए टाल दिया है।
शासन के इस कथित यू-टर्न से प्रदेश के पेंशनरों में गहरी हैरानी और नाराजगी है। उत्तराखण्ड कार्मिक एकता मंच ने पूरे मामले को टाल-मटोल और भ्रामक कार्यप्रणाली बताते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र भेजकर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा मांगों पर शीघ्र निर्णय लेने की मांग की है।
मंच के संस्थापक अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी रमेश चन्द्र पाण्डे ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और मुख्य सचिव को मेल के माध्यम से पत्र भेजा।
पत्र के अनुसार, पेंशन के राशिकरण की वसूली अवधि कम करने तथा 65 से 80 वर्ष की आयु पर 5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक अतिरिक्त पेंशन वृद्धि की मांग के परीक्षण के लिए वित्त विभाग ने 11 नवम्बर 2024 को निदेशक, कोषागार की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति को 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
इस संबंध में 14 फरवरी 2025 को अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बैठक भी आयोजित हुई। इसके बाद 11 अप्रैल 2025 को वित्त विभाग ने निदेशक, कोषागार को पत्र भेजकर तत्काल सुविचारित प्रस्ताव अथवा आख्या शासन को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। इसके बावजूद समिति की संस्तुति शासन को प्राप्त नहीं हुई।
मामले में उस समय और अधिक रोचक स्थिति पैदा हुई, जब सेवानिवृत्त कार्मिक समन्वय समिति ने उक्त दोनों मांगों सहित कुल चार मांगों को लेकर 3 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा। मुख्यमंत्री स्तर से मिले आश्वासन की खबर अगले दिन प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई।
वहीं दूसरी ओर, इसी ज्ञापन के संदर्भ में वित्त विभाग द्वारा 26 फरवरी 2026 को समिति के मुख्य संयोजक सुमन सिंह वाल्दिया को भेजे गए प्रत्युत्तर में बताया गया कि गठित समिति ने अब तक शासन को कोई संस्तुति उपलब्ध नहीं कराई है।
मंच के संस्थापक अध्यक्ष रमेश चन्द्र पाण्डे ने बताया कि पूरे मामले में नया और हैरान करने वाला मोड़ तब आया, जब कार्मिक एवं सतर्कता विभाग द्वारा पेंशनरों की मांगों के संबंध में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 12 अगस्त को हुई बैठक का कार्यवृत्त जारी किया गया।
19 अगस्त को जारी कार्यवृत्त के बिन्दु संख्या 4 और 5 में पूर्व में अपनाई गई पूरी प्रक्रिया को नजरअंदाज करते हुए इन मांगों को यह कहते हुए टाल दिया गया कि— “8वें वेतन आयोग की संस्तुति के क्रम में वित्त विभाग द्वारा विचार किया जाएगा।”
कार्मिक एकता मंच ने इस निर्णय पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि 8वां वेतन आयोग केंद्र सरकार के लिए है, राज्य सरकार के लिए नहीं। मंच का कहना है कि केंद्र सरकार ने भी 8वें वेतन आयोग को इन मांगों पर विचार करने का कोई अधिकार अथवा Terms of Reference नहीं दिया है। मंच ने सवाल किया कि यदि मामला पहले से ही 8वें वेतन आयोग के विचाराधीन होना था, तो वर्ष 2024 में इन मांगों के परीक्षण के लिए समिति का गठन आखिर क्यों किया गया।
रमेश चन्द्र पाण्डे ने कहा कि शासन की इस टाल-मटोल और भ्रामक कार्यप्रणाली से राज्य प्राप्ति आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले प्रदेश के लगभग 1.50 लाख पेंशनर्स के बीच गहरी हैरानी और नाराजगी है। साथ ही इसका प्रतिकूल प्रभाव सरकार की छवि पर भी पड़ रहा है।
उत्तराखण्ड कार्मिक एकता मंच ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में इस पूरे मामले में शासन के यू-टर्न के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और पेंशनरों की लंबित मांगों पर शीघ्र स्पष्ट आदेश जारी करने की मांग की है।













