ब्रह्मलीन स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज की षोडशी पर उमड़ा संत समाज, विशाल संत भंडारे में संत-महापुरुषों ने अर्पित किए श्रद्धासुमन

गुरु भक्ति, तपस्या और त्याग की प्रतिमूर्ति थे स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज : संत-महापुरुष


हरिद्वार (कमल शर्मा)। बिरला घाट रोड स्थित श्री श्री भोलानन्द संन्यास आश्रम में परम पूज्य दिव्य संत मुनि जी महाराज के परम शिष्य ब्रह्मलीन स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज की पावन स्मृति में षोडशी संस्कार, विशाल संत समागम एवं संत भंडारे का भव्य आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में संत-महापुरुषों, महामंडलेश्वरों, महंतों एवं श्रद्धालु भक्तों ने पहुंचकर ब्रह्मलीन संत को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
उल्लेखनीय है कि स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज ने 16 अक्टूबर 2026 को अपना भौतिक शरीर त्यागकर प्रभु के श्रीचरणों में स्थान प्राप्त किया था। उनके ब्रह्मलीन होने से संत समाज एवं भक्त मंडली में शोक की लहर व्याप्त हो गई थी। षोडशी संस्कार के अवसर पर आयोजित संत समागम में संतों ने उनके आध्यात्मिक जीवन, गुरु निष्ठा, तपस्या और समाज के प्रति समर्पण को याद करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
इस अवसर पर प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी तेजसानंद गिरी जी महाराज ने भावपूर्ण उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि संत-महापुरुषों का संपूर्ण जीवन मानवता के कल्याण, धर्म की रक्षा और ईश्वर भक्ति के लिए समर्पित रहता है। संत भले ही शरीर रूप में हमारे बीच उपस्थित न हों, लेकिन उनकी शिक्षाएं, आदर्श और आध्यात्मिक विचार सदैव समाज को सही मार्ग दिखाते रहते हैं। स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज का जीवन गुरु भक्ति, साधना और संत परंपरा के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक था। उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
पंचायती श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरी जी महाराज ने कहा कि संतों का जीवन त्याग, तपस्या, संयम और परोपकार की अनुपम मिसाल होता है। संत समाज सदैव मानवता को प्रेम, सद्भाव, सेवा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज ने अपने गुरु के सानिध्य में आध्यात्मिक संस्कारों को आत्मसात कर संत परंपरा के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। उनका जीवन और उनकी स्मृतियां सदैव श्रद्धा एवं सम्मान के साथ याद की जाती रहेंगी।
आश्रम के महंत एवं अध्यक्ष स्वामी रमेश पुरी जी महाराज ने कहा कि गुरु और संतों का सानिध्य मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित करता है। संतों की वाणी में ज्ञान और उनके आचरण में त्याग एवं लोककल्याण की भावना समाहित होती है। स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज का ब्रह्मलीन होना संत समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। षोडशी संस्कार एवं संत भंडारे जैसे आयोजन ब्रह्मलीन संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं को जीवंत रखने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।


पंचायती श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत राज गिरी जी महाराज ने कहा कि संतों का जीवन संसार को सत्य, धर्म और सदाचार की राह दिखाने के लिए समर्पित होता है। गुरु के प्रति समर्पण और प्रभु के चरणों में अटूट आस्था ही सच्ची साधना की पहचान है। स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज ने अपने जीवन से गुरु निष्ठा एवं आध्यात्मिक मूल्यों का संदेश दिया। उनकी पावन स्मृति में आयोजित संत समागम संतों की सेवा, सम्मान और सनातन संस्कृति के संरक्षण का भी प्रतीक है।
कार्यक्रम में उपस्थित अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद श्री निरंजनी के सचिव श्री राम रतन गिरी महाराज ने ब्रह्मलीन स्वामी दुर्गानंद गिरी जी महाराज के आध्यात्मिक जीवन एवं उनके गुरु के प्रति समर्पण को याद करते हुए कहा कि संतों का शरीर नश्वर होता है, लेकिन उनके विचार, साधना और संस्कार युगों-युगों तक मानव समाज को प्रेरणा देते रहते हैं।


इस अवसर पर श्रीमहंत रघुवीर दास जी महाराज, महंत जयरामदास जी महाराज, महंत सूरज दास जी महाराज, कोतवाल कमल मुनि जी महाराज सहित भारी संख्या में संत-महापुरुष एवं श्रद्धालु भक्त उपस्थित रहे। सभी ने ब्रह्मलीन संत के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके प्रति अपनी आस्था एवं सम्मान प्रकट किया।
अंत में विशाल संत भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें संत-महापुरुषों की श्रद्धापूर्वक सेवा की गई। इस प्रकार आश्रम में आयोजित षोडशी संस्कार एवं संत समागम ने गुरु भक्ति, संत सेवा, त्याग और समर्पण की सनातन परंपरा का भव्य संदेश दिया।

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