हरिद्वार (कमल शर्मा)। कनखल संन्यास रोड स्थित हरि भारती विद्यालय में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और वामन भगवान के अलौकिक चरित्र के रस में सराबोर हो गए। कथा व्यास ने भगवान वामन अवतार तथा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अत्यंत भावपूर्ण और भक्तिरस से ओतप्रोत वर्णन करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कथा के दौरान व्यास पीठ से बताया गया कि जब असुरराज बलि के प्रभाव से तीनों लोकों में देवताओं का अधिकार समाप्त होने लगा, तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर धर्म की पुनर्स्थापना की। भगवान वामन ने तीन पग भूमि मांगकर अपने विराट स्वरूप से समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया और राजा बलि के अहंकार का हरण करते हुए उन्हें भक्ति और समर्पण का संदेश दिया। इस प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को विनम्रता, दानशीलता और भगवान के प्रति समर्पण की प्रेरणा दी गई।

कथा के दूसरे प्रमुख प्रसंग में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अत्यंत मनोहारी वर्णन हुआ। जैसे ही कथा व्यास ने कारागार में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रसंग सुनाया, पूरा पंडाल “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोषों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया तथा भजन-कीर्तन और नृत्य के साथ जन्मोत्सव को उत्सव के रूप में मनाया। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, वसुदेव द्वारा यमुना पार कर उन्हें गोकुल पहुंचाने तथा नंदोत्सव के प्रसंगों का जीवंत वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

इस अवसर पर आशीर्वचन देते हुए महामंडलेश्वर परम पूज्य श्री कुर्सी पुरी जी महाराज ने कहा कि “श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव जीवन को सदाचार, भक्ति और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करने वाली दिव्य ज्ञानगंगा है। भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था।

यदि मनुष्य अपने जीवन में भगवान के आदर्शों और शिक्षाओं को धारण कर ले तो उसका जीवन सफल हो जाता है। कथा श्रवण से मन की अशुद्धियां दूर होती हैं और व्यक्ति में सेवा, करुणा तथा भक्ति के संस्कार विकसित होते हैं।”
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आरती एवं प्रसाद ग्रहण कर धर्मलाभ प्राप्त किया। कथा स्थल पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर श्रीमद्भागवत कथा का रसपान कर रहे हैं।




