सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष की अमृतमयी कथा से भावविभोर हुए श्रद्धालु, कथा यजमान प्रकाश जोशी ने संत-महंतों का जताया आभार

हरिद्वार, (कमल शर्मा)। कनखल स्थित श्री यंत्र मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन कथा व्यास नीरज जोशी ने श्रद्धालुओं को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के दिव्य प्रसंगों का भावपूर्ण रसपान कराया। कथा के दौरान पूरा वातावरण भक्ति, भाव और श्रद्धा से सराबोर हो उठा।


कथा व्यास ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता केवल सांसारिक मित्रता नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के प्रेम का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि निर्धन ब्राह्मण सुदामा अत्यंत गरीबी और अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और विश्वास था।

पत्नी के आग्रह पर जब सुदामा द्वारिका पहुंचे तो उनके पास भगवान को अर्पित करने के लिए केवल मुट्ठीभर चिवड़ा था।
जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखा सुदामा को देखा, वे सिंहासन से दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। भगवान ने स्वयं सुदामा के चरण धोकर संसार को यह संदेश दिया कि सच्चा प्रेम और भक्ति ही सबसे बड़ा धन है।

कथा व्यास ने कहा कि भगवान अपने भक्त के भाव के भूखे होते हैं, वैभव के नहीं। श्रीकृष्ण ने बिना मांगे ही सुदामा के सारे कष्ट दूर कर दिए और उनकी झोपड़ी को महल में परिवर्तित कर दिया।
इसके बाद कथा व्यास ने द्वादश स्कंध में वर्णित परीक्षित मोक्ष प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित को जब श्रापवश सात दिन में मृत्यु का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने राजपाट और मोह-माया का त्याग कर गंगा तट पर संतों की शरण ग्रहण की। वहां परम ज्ञानी शुकदेव मुनि ने उन्हें सात दिनों तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई।


कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मोक्ष प्रदान करने वाला दिव्य ज्ञान है। राजा परीक्षित ने कथा श्रवण के माध्यम से मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त की और भगवान के चरणों में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त हुए। यह प्रसंग मनुष्य को जीवन की नश्वरता और भक्ति की महिमा का संदेश देता है।


कथा के समापन अवसर पर कथा के मुख्य यजमान प्रकाश जोशी ने कथा के प्रारंभ से लेकर सातवें दिन तक पधारे सभी संत-महंतों, अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “यह हमारे परिवार का सौभाग्य है कि श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से संतों का सानिध्य और भगवान की कृपा प्राप्त हुई। कथा में प्रतिदिन संत-महंतों और श्रद्धालुओं का जो प्रेम और आशीर्वाद मिला, वह जीवनभर अविस्मरणीय रहेगा।”


उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा समाज को धर्म, संस्कार और मानवता की राह दिखाने का कार्य करती है तथा ऐसे आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना जागृत करते हैं।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। कथा के पश्चात भंडारे एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया।

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