देहरादून में एक कॉलोनी विवाद से शुरू हुआ मामला अब केवल पड़ोसियों के बीच तनाव का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रकरण उत्तराखंड पुलिस की कार्यप्रणाली, जांच की निष्पक्षता, नाबालिगों की सुरक्षा, पुलिस जवाबदेही और कानून व्यवस्था पर गंभीर सार्वजनिक बहस का रूप ले चुका है।
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के प्रदेश अध्यक्ष अनुपम खत्री ने अपने लगभग 1 घंटा 41 मिनट लंबे LIVE प्रसारण में देहरादून पुलिस की जांच प्रक्रिया और “ऑपरेशन प्रहार” अभियान पर कई तीखे सवाल खड़े किए। उनका LIVE केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि दस्तावेज़ों, शिकायत पत्रों, NCR रिकॉर्ड, पुलिस कार्रवाई और कथित घटनाक्रमों के आधार पर उठाया गया सार्वजनिक सवालनामा प्रतीत हुआ।
नाबालिगों को धमकी, घर की निगरानी और घेराव के आरोप
मामले का केंद्र एक ऐसी शिकायत है जिसमें आरोप लगाया गया कि नाबालिग बच्चों को डराया-धमकाया गया, परिवार की गतिविधियों पर नजर रखी गई, वीडियो रिकॉर्डिंग की गई तथा बाहरी लोगों को बुलाकर घर का घेराव किया गया। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि कई घटनाओं के वीडियो साक्ष्य पुलिस को सौंपे गए, 112 पर लगातार कॉल की गईं और वरिष्ठ अधिकारियों को कई प्रार्थना पत्र भी दिए गए।
इसके बावजूद मामला FIR में तब्दील न होकर NCR की धारा 352 तक सीमित रहा। यही बिंदु अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
“पड़ोसी विवाद” कहकर गंभीर आरोपों को दबाने का आरोप
LIVE के दौरान अनुपम खत्री ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी स्वप्निल मुयाल ने मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे “साधारण पड़ोसी विवाद” की तरह प्रस्तुत किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि शिकायतों में नाबालिगों को धमकाने, परिवार को घेरने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भय का माहौल बनाने जैसे गंभीर आरोप शामिल थे, तो जांच सीमित क्यों रखी गई?
उन्होंने पूछा—
क्या वीडियो साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच हुई?
क्या सभी गवाहों के बयान दर्ज किए गए?
क्या कथित बाहरी व्यक्तियों की पहचान की गई?
क्या 112 कॉल लॉग और पुलिस मूवमेंट की जांच हुई?
इन सवालों का अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक उत्तर सामने नहीं आया है।
पुलिस पर पक्षपातपूर्ण रवैये के आरोप
अनुपम खत्री ने LIVE में यह भी आरोप लगाया कि थाना स्तर के कुछ अधिकारियों का रवैया निष्पक्ष जांचकर्ता की बजाय एक पक्ष के समर्थन जैसा दिखाई दिया। पूर्व थाना प्रभारी अशोक राठौर का नाम लेते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता परिवार को सुरक्षा देने के बजाय उन पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया।
खत्री का कहना है कि नवंबर 2025 से वह लगातार पुलिस को रात्रिकालीन गतिविधियों, संदिग्ध घटनाओं और दबाव की शिकायतें देते रहे, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने दावा किया कि पूरे घटनाक्रम में शामिल कुछ लोगों को स्थानीय स्तर पर संरक्षण प्राप्त है।
सोशल मीडिया ट्रायल और छवि धूमिल करने की साजिश का आरोप
LIVE में अनुपम खत्री ने आरोप लगाया कि उन्हें योजनाबद्ध तरीके से बदनाम करने और झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में व्यक्तिगत द्वेष और दबाव की राजनीति कर रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया, कॉलोनी विवाद और व्यक्तिगत आरोपों का इस्तेमाल कर उनकी सार्वजनिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
बाहरी प्रभाव और भूमाफिया नेटवर्क पर भी उठे सवाल
LIVE के दौरान खत्री ने नेहा बजाज और “बंटी” नामक व्यक्ति का उल्लेख करते हुए गंभीर आरोप लगाए। हालांकि इन आरोपों की अभी तक किसी स्वतंत्र या न्यायिक जांच से पुष्टि नहीं हुई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर उत्तराखंड में बाहरी प्रभावशाली नेटवर्क किस प्रकार स्थानीय तंत्र पर प्रभाव बना पा रहे हैं और क्या पुलिस ने कभी निष्पक्ष तरीके से इसकी जांच की है।
“ऑपरेशन प्रहार” पर सवाल, “ऑपरेशन सुधार” की चेतावनी
अनुपम खत्री ने उत्तराखंड पुलिस के “ऑपरेशन प्रहार” अभियान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि प्रदेश में नशा, भूमाफिया, बाहरी आपराधिक नेटवर्क और स्थानीय लोगों के उत्पीड़न की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो केवल प्रचारात्मक अभियानों से कानून व्यवस्था की वास्तविक स्थिति नहीं बदलेगी।
उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग करते हुए कहा कि यदि सुधार नहीं हुआ तो जनता स्वयं “ऑपरेशन सुधार” शुरू करेगी।
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम
पूरा मामला अब कुछ बेहद महत्वपूर्ण सवालों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है—
यदि शिकायतें गंभीर थीं तो FIR क्यों नहीं हुई?
यदि FIR योग्य नहीं थीं तो जांच का आधार क्या था?
यदि जांच हुई तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?
क्या वीडियो साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच हुई?
क्या पुलिस मूवमेंट और 112 कॉल रिकॉर्ड की समीक्षा की गई?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की विश्वसनीयता केवल शक्ति से नहीं बल्कि निष्पक्षता और पारदर्शिता से स्थापित होती है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में यह बहस अब केवल एक कॉलोनी विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह जनता के भरोसे और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बन चुकी है।
अनुपम खत्री द्वारा उठाए गए सवालों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन इन्हें केवल “पड़ोसियों का विवाद” कहकर खारिज करना अब आसान नहीं दिखता। जनता अब दस्तावेज़, प्रक्रिया और जवाबदेही — तीनों देखना चाहती है।
और शायद इसी कारण अब “ऑपरेशन प्रहार” के साथ-साथ “ऑपरेशन सुधार” भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन चुका है।
“ऑपरेशन प्रहार” या “ऑपरेशन सुधार”?देहरादून पुलिस की जांच पर उठे गंभीर सवाल, LIVE में गरजे वरिष्ठ पत्रकार अनुपम खत्री



