कमल शर्मा (हरिहर समाचार)
हरिद्वार। खड़खड़ी स्थित प्रसिद्ध श्री नेहकलक आश्रम में प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान महंत उत्तम सिंह जी महाराज, माता संतोष जी महाराज, संत प्यार सिंह महाराज, महंत श्याम सिंह महाराज एवं महंत शर्म सिंह महाराज सहित सभी पूज्य गुरुजनों की पावन स्मृति में एक विशाल संत समागम एवं भंडारे का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम परम पूज्य महंत जीत सिंह जी महाराज एवं स्वामी हरनाम सिंह जी महाराज के पतित-पावन सानिध्य में आयोजित किया गया, जिसमें संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं और गणमान्य नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

इस अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए महंत जीत सिंह जी महाराज ने कहा कि गुरु की महिमा का वर्णन करना समुद्र की गहराई नापने के समान है। गुरु वह दिव्य शक्ति हैं, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। जब मनुष्य जीवन पथ पर भ्रमित हो जाता है, तब गुरु ही उसे सही दिशा दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता हमें जन्म देते हैं, परंतु गुरु हमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने की कला सिखाते हैं। गुरु शिष्य के जीवन को उसी प्रकार तराशते हैं जैसे मूर्तिकार पत्थर को तराशकर सुंदर प्रतिमा बना देता है।

स्वामी श्री हरनाम दास महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा विश्व में अद्वितीय रही है। आश्रमों में शिष्य केवल वेद-शास्त्रों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि संयम, अनुशासन, सेवा और परिश्रम का संस्कार भी प्राप्त करते थे। यही परंपरा हमारे समाज की आत्मा है।

महंत बलवंत सिंह महाराज ने कहा कि योग्य गुरु के मार्गदर्शन में साधारण शिष्य भी असाधारण उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। गुरु शिष्य की अंतर्निहित प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारते हैं और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
महंत सूरज दास महाराज ने कहा कि गुरु का आशीर्वाद शिष्य के लिए अमूल्य धन के समान है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में गुरु की दी हुई सीख ही संबल बनती है। गुरु केवल सफलता का मार्ग नहीं दिखाते, बल्कि असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते हैं।
महंत विष्णु दास जी महाराज ने कहा कि सच्ची सफलता धन और पद में नहीं, बल्कि उच्च चरित्र और श्रेष्ठ विचारों में निहित है। गुरु शिष्य को सत्य, ईमानदारी और परिश्रम का मार्ग अपनाने की शिक्षा देते हैं। सच्चा गुरु वही है, जो शिष्य को केवल जानकारी नहीं, बल्कि विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करे।
महंत श्री नारायण दास पटवारी महाराज ने कहा कि गुरु का सम्मान करना और उनके उपदेशों का पालन करना प्रत्येक विद्यार्थी का प्रथम कर्तव्य है। आधुनिक युग में शिक्षा के साधन भले बदल गए हों, किंतु गुरु का महत्व आज भी उतना ही है जितना प्राचीन काल में था।
स्वामी कृष्ण देव महाराज ने कहा कि गुरु की महिमा अनंत है और उनके उपकारों का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता। उनके आदर्शों पर चलकर ही सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की जा सकती है।
समागम के उपरांत विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ अर्जित किया। कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत रहा।
