कमल शर्मा (हरिहर समाचार)
हरिद्वार , चंडी घाट स्थित श्री नीलेश्वर महादेव मंदिर तथा गौरी शंकर मंदिर भारतीय सनातन परंपरा के अत्यंत प्राचीन और पावन तीर्थस्थल माने जाते हैं। इन मंदिरों की महिमा का संबंध भगवान भोलेनाथ की दिव्य बारात से जोड़ा जाता है, जिससे इनका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि स्वयं देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती के साथ इस क्षेत्र को पावन किया था, तभी से यह स्थान शिव-शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र बन गया। यहाँ की भूमि, वायु और वातावरण में आज भी शिव कृपा की दिव्यता का अनुभव होता है, जो भक्तों के मन को शांति और श्रद्धा से भर देता है।श्री नीलश्वर महादेव मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालु सच्चे मन, आस्था और विश्वास के साथ भगवान भोलेनाथ एवं माता पार्वती की आराधना करते हैं। ऐसा विश्वास है कि जो भी भक्त यहाँ अपनी मनोकामना लेकर आता है, उसकी प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है। यह मंदिर केवल इच्छापूर्ति का स्थान ही नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का केंद्र भी है, जहाँ व्यक्ति अपने जीवन की दिशा को सकारात्मक रूप से बदलने की प्रेरणा प्राप्त करता है।इस पावन धाम की परंपरा को ब्रह्मलीन गुरुदेव श्री महंत महामंडलेश्वर 1008 प्रेमदास जी महाराज ने अपने तप, साधना और त्याग से अत्यंत गौरव प्रदान किया। वे तपोमूर्ति संत थे, जिनका संपूर्ण जीवन धर्म, सेवा और मानव कल्याण को समर्पित रहा। उन्होंने भक्तों को केवल उपदेश ही नहीं दिए, बल्कि अपने आचरण से धर्म का मार्ग दिखाया। उनका सान्निध्य पाने वाले श्रद्धालु स्वयं को सौभाग्यशाली मानते थे, क्योंकि उनके वचनों में अनुभूति और साधना की सजीव झलक मिलती थी।उनके उत्तराधिकारी श्री महंत हरिदास जी महाराज भी उसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे तेजस्वी, तपस्वी और ज्ञानमूर्ति संत हैं, जिनके विचारों में शास्त्रों का गहन ज्ञान और जीवन का व्यावहारिक अनुभव समाहित है। वे भक्तों को धर्म और कर्म के मार्ग पर चलकर सत्य, संयम और सेवा के माध्यम से जीवन का कल्याण करने की प्रेरणा देते हैं। उनके उपदेशों से यह संदेश मिलता है कि सच्ची भक्ति वही है, जो मानव को श्रेष्ठ आचरण और परोपकार की ओर ले जाए।
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर आज इस दिव्य स्थल पर विशाल संत भंडारे का आयोजन भक्तजनों द्वारा श्रद्धा, सेवा और समर्पण भाव से किया गया। इस अवसर पर वातावरण भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया। श्री महंत हरिदास जी महाराज ने अपने श्रीमुख से भक्तों के बीच ज्ञान की अमृतवर्षा की और जीवन को सार्थक बनाने के सूत्र बताए। उनका संदेश था कि भगवान शिव की सच्ची उपासना तभी पूर्ण होती है, जब मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध रखे, दूसरों के प्रति करुणा भाव अपनाए और धर्म के मार्ग पर अडिग रहे। इस प्रकार यह पावन आयोजन भक्तों के लिए न केवल उत्सव, बल्कि आत्मिक जागरण का माध्यम भी बना।
