भारतीय भाषा समिति के आर्थिक अनुदान से श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार में आज भारतीय भाषा सम्मेलन का आयोजन

हरिद्वार, भारतीय भाषा समिति के आर्थिक अनुदान से श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार में आज भारतीय भाषा सम्मेलन का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता माननीय प्रो. यशवीर सिंह जी, अध्यक्ष प्रबन्धसमिति ने की। सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व केन्द्रीय शिक्षामन्त्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशङ्क’ जी ऑनलाईन माध्यम से उपस्थित रहें। अपने वक्तव्य में आपने कहा कि यदि राष्ट्र की उन्नति चाहते हो तो राष्ट्रभाषा एवं मातृभाषा की वैज्ञानिकता को समझना होगा। फॉनिक्स विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति मनीष पाण्डेय जी ने अपने विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य में भाषा एवं भक्ति का सुन्दर समन्वय स्थापित किया। इस अवसर पर उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘केदारनाथ का खच्चर’ का विमोचन किया गया। हिमाचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. श्रुतिदत्त शर्मा ने भाषाभिव्यक्ति एवं भाषा की वैज्ञानिकता पर अपने सारगर्भित विचारों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि भाषा की वैज्ञानिकता का तात्पर्य उसके सुव्यवस्थित, तर्कसंगत और नियमानुशासित स्वरूप से है। संस्कृत शिक्षा निदेशक उत्तराखण्ड श्रीमती कञ्चन देवराड़ी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के वैज्ञानिक युग में वही भाषा लोकप्रिय होगी जिसका व्याकरण विज्ञान संगत होगा, जिसकी लिपि कम्प्यूटर की लिपि होगी।

    सम्मेलन में महाविद्यालय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक जिसका शीर्षक – संस्कृतसाहित्ये जलसंरक्षणम् है; का भी विमोचन किया गया।

    सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. वेदप्रकाश उपाध्याय जी ने कहा कि ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृत-संस्कृतिस्तथा’ इस उक्ति से ही भारतवर्ष की दो प्रतिष्ठाओं संस्कृत तथा संस्कृति के महत्व के विषय में अभिज्ञान हो जाता है। यह निर्विवाद सत्य ही है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा संस्कृत के बिना असम्भव ही है।

    मुख्यवक्ता के रूप में उपस्थित नालन्दा विश्वविद्यालय के विजिटिंग आचार्य प्रो. श्रवण कुमार शर्मा जी ने कहा कि केवल अपने पाण्डित्य को सिद्ध करना ही भाषा का औचित्य नहीं होता अपितु भाषाओं में निहित वैज्ञानिक तथ्यों को समाज के समक्ष उपस्थित करना एवं एक उत्तम भविष्य का निर्माण करना भी होता है। संस्कृत भारती उत्तराखण्ड के प्रदेश अध्यक्ष प्रो. आनन्द भारद्वाज जी ने रामचरितमानस एवं भगवद्गीता में निहित भाषा सौन्दर्य को प्रस्तुत करते हुए उनके ज्ञान-विज्ञान से सभी को परिचित कराया।  

    मध्याह्न उपरान्त सञ्चालित शोधपत्र वाचन सत्र की अध्यक्षता गुरुकुल काङ्गड़ी विश्वविद्यालयस्थ संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो. ब्रह्मदेवविद्यालङ्कार जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. केदार प्रसाद परोहा एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृत भारती उत्तराखण्ड के प्रान्त सङ्घटनमन्त्री श्री गौरव शास्त्री जी उपस्थित रहें। मुख्यवक्ता के रूप में डॉ. भारती शर्मा, एस.डी.पी.जी. कॉलेज रुड़की, डॉ. प्रेमचन्द्र शास्त्री, पूर्व उपाध्यक्ष उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी, डॉ. वेदव्रत जी एवं डॉ. बबलू वेदालङ्कार सहायकाचार्य गुरुकुल काङ्गड़ी विश्वविद्यालय उपस्थित रहे। इस सत्र में 16 शोधार्थियों ने अपने-अपने शोधपत्र प्रस्तुत किये।

    सत्र की समाप्ति पर महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. रवीन्द्र कुमार जी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। सत्र का कार्यक्रम का संयोजन डॉ. आशिमा श्रवण व सत्र संयोजन श्री आदित्य प्रकाश जी ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहें।

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