💥अष्टादश संस्कृत महोत्सव एवं राज्यस्तरीय संस्कृत प्रतियोगिताओं का आयोजन
🌸परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज का पावन सान्निध्य एवं उनके करकमलों से उद्घाटन
🌺संस्कृत की प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
हरिद्वार, 23 अक्टूबर। उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान, उत्तराखण्ड सरकार द्वारा संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, संवर्धन तथा विद्यार्थियों की अंतर्निहित प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अष्टादश संस्कृत महोत्सव एवं राज्यस्तरीय संस्कृत प्रतियोगिताओं का आयोजन 23 एवं 24 अक्टूबर को महाजन भवन, भूतवाला, हरिद्वार में किया गया।
संस्थान द्वारा प्रदेश के तेरह जनपदों में आयोजित

जनपदस्तरीय प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं ने इस राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में सहभाग किया। इन प्रतियोगिताओं का उद्देश्य संस्कृत भाषा के प्रति विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाना, उनकी प्रतिभा को मंच प्रदान करना तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता विकसित करना है।

महोत्सव के अंतर्गत संस्कृत नाटक, संस्कृत समूह नृत्य, संस्कृत समूहगान, संस्कृत वाद-विवाद, संस्कृत आशुभाषण तथा श्लोकोच्चारण सहित विभिन्न प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही है। विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के कनिष्ठ और वरिष्ठ वर्ग के विद्यार्थी अपनी प्रतिभा का दर्शन करा रहे हैं।

उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान में आयोजित उद्घाटन समारोह में परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर अनेक गणमान्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, आचार्य, विभूतियों, संस्कृतप्रेमियों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों ने सहभाग किया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, भारत की आत्मा, ऋषियों की चेतना और सनातन संस्कृति की शाश्वत वाणी है। संस्कृत की प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा है। संस्कृत सीखेंगे तो संस्कृति आएगी, संस्कृति सीखेंगे तो संस्कार आएँगे और संस्कारों से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण होगा।

आज के युग में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आवश्यक है, परंतु एआई से पहले हमें आरआई (ऋषि इंटेलिजेंस) चाहिए, वह दिव्य बुद्धि, जो ज्ञान के साथ विवेक, विकास के साथ मूल्य और प्रगति के साथ करुणा प्रदान करे। हमारे ऋषियों ने अपनी वाणी, वेदों और ज्ञान-परंपरा के माध्यम से भारत की चेतना को युगों तक जीवंत रखा है।
आइए, सोच स्पष्ट रखें, निर्णय दृढ़ करें और ‘मेरे लिए क्या’ से आगे बढ़कर ‘मेरे द्वारा क्या’ तथा ‘मेरा प्रदेश कैसे बेहतर बने’ का संकल्प लें। ऐसा भविष्य गढ़ें, जहाँ भव्यता भी हो, दिव्यता भी; विज्ञान भी हो, सनातन भी; गति भी हो और आध्यात्मिकता भी। संस्कृत बचेगी तो संस्कृति सशक्त होगी, संस्कृति सशक्त होगी तो भारत का गौरव और माँ भारती की चेतना चिरंजीवी रहेगी।”

इस अवसर पर संस्कृत के विद्वानों और आचार्यों ने संस्कृत व संस्कृति के विषय में अपने वक्तव्य दिये।
यह महोत्सव संस्कृत भाषा की समृद्ध परंपरा को जन-जन तक पहुँचाने, युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने तथा संस्कृत को शिक्षा, संवाद और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की सशक्त भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।













