अमेरिकन आश्रम विवाद में नए सवाल, ढाई माह की चुप्पी पर उठी उंगली



कब से आश्रम के कब्जे में है भूमि, किसके नाम दर्ज है संपत्ति? लीज, बायलॉज और पुराने मुकदमों की स्थिति स्पष्ट करने की मांग
हरिद्वार, भूपतवाला स्थित स्वामी देवानंद भारत भक्ति आश्रम (अमेरिकन आश्रम) की भूमि को लेकर पिछले करीब ढाई माह से चल रहे विवाद में अब प्रबंधक परमजीत कौर और कांग्रेस नेता मनोज सैनी की ओर से लगाए गए आरोपों पर ही सवाल उठने लगे हैं। आश्रम की भूमि पर कब्जे और भूमाफिया से मिलीभगत के आरोप लगाए जाने के बाद यह सवाल प्रमुखता से सामने आया है कि यदि मामला इतना गंभीर था तो इतने लंबे समय तक चुप्पी क्यों साधी गई और अब तक विवादित भूमि से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?
विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल भूमि के वास्तविक स्वामित्व को लेकर है। आश्रम के पास कुल कितनी भूमि है, यह भूमि राजस्व अभिलेखों में किसके नाम दर्ज है और आश्रम पिछले कितने वर्षों से इस भूमि पर संचालित है, इसकी स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग उठ रही है।
लीज पर है संस्था तो नवीनीकरण कब हुआ?
आश्रम की संपत्ति यदि लीज पर है तो उसकी मूल लीज कब हुई, कितनी अवधि के लिए हुई और वर्तमान में वह वैध एवं नवीनीकृत है या नहीं—यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। यदि लीज का नवीनीकरण नहीं हुआ तो आश्रम प्रबंधन द्वारा इस दिशा में क्या कार्रवाई की गई, इसका जवाब भी सामने आना चाहिए।
बायलॉज और सदस्यों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग
आश्रम की संस्था के बायलॉज के अनुसार सदस्य बनने की प्रक्रिया क्या है? संस्था के वर्तमान सदस्य एवं पदाधिकारी कौन हैं? आश्रम की स्वामिनी के कनाडा में रहने के दौरान संस्था के संचालन और संपत्ति संबंधी निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं? इन सवालों पर भी स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता बताई जा रही है।
2015-16 के हाईकोर्ट मामले की भी हो निष्पक्ष जानकारी
विवाद से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न वर्ष 2015-16 में हाईकोर्ट में लड़े गए मुकदमे को लेकर भी है। यह मुकदमा कितने वर्षों तक चला, किसके खिलाफ लड़ा गया और अदालत का अंतिम निर्णय क्या रहा? यदि संस्था मुकदमा जीत गई थी तो उसके बाद संस्था अथवा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया क्यों नहीं कराई गई? जिस व्यक्ति अथवा पक्ष के खिलाफ मुकदमा लड़ा गया था, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है—इन सभी तथ्यों को दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक किए जाने की मांग की जा रही है।
तहसीलदार न्यायालय में लंबित मामले की स्थिति क्या?
वहीं, तहसीलदार न्यायालय में लंबित मामले को लेकर भी स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। मामला किस पक्ष के खिलाफ है, विवादित भूमि राजस्व अभिलेखों में किसके नाम दर्ज है और न्यायालय में अब तक क्या कार्रवाई हुई है, इसका पूरा विवरण सामने आने पर ही विवाद की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
आश्रम ने वर्षों में क्या सामाजिक योगदान किया?
विवाद के बीच एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आश्रम ने पिछले वर्षों में क्षेत्र के लिए कितने और किस प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक अथवा जनसेवा से जुड़े कार्य किए हैं। आश्रम की ओर से किए गए सेवा कार्यों का ब्यौरा भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों के सामने आश्रम की वास्तविक गतिविधियों की पूरी तस्वीर आ सके।
राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों पर भी स्थिति हो स्पष्ट
पूरे विवाद में राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि आश्रम के भूमि विवाद में किन राजनीतिक व्यक्तियों की भूमिका बताई जा रही है और उनके संबंध में लगाए जा रहे आरोपों का आधार क्या है। महज आरोप-प्रत्यारोप के बजाय यदि संबंधित पक्ष दस्तावेज और न्यायालयीन रिकॉर्ड सार्वजनिक करें तो विवाद की सच्चाई सामने आने में मदद मिलेगी।
स्थानीय लोगों और संत समाज का कहना है कि धार्मिक संस्था की संपत्ति से जुड़ा मामला गंभीर है। इसलिए आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच प्रशासन को राजस्व अभिलेख, लीज डीड, संस्था के बायलॉज, न्यायालयीन प्रकरणों तथा भूमि की वर्तमान स्थिति की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। इससे न केवल आश्रम की संपत्ति को लेकर स्थिति साफ होगी, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे विवाद का भी स्थायी समाधान निकल सकेगा।

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