कृषि भूमि पर कॉलोनियां बसाने पर हाईकोर्ट सख्त, HRDA को फटकार — एक हफ्ते में जवाब तलब

कमल शर्मा (हरिहर समाचार)
हरिद्वार, 11 मार्च 2026।
जनहित याचिका संख्या 116/2023 अतुल कुमार चौहान बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य में आज माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस याचिका में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर जनपद हरिद्वार में कृषि एवं बाग की भूमि पर अवैध रूप से कॉलोनियों और ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं के निर्माण का मुद्दा उठाया गया है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि यह मामला माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका संख्या 119/2013 में पारित आदेश दिनांक 19 जून 2018 के उल्लंघन से जुड़ा है। उक्त आदेश में न्यायालय ने प्रदेश में कृषि भूमि की कमी को देखते हुए कृषि एवं बागवानी भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने पर स्पष्ट रोक लगाई थी। न्यायालय ने केवल उस स्थिति में छूट दी थी जब कोई किसान अपने स्वयं के निवास के लिए सीमित भूमि पर मकान बनाना चाहता हो। इसके अतिरिक्त ग्रुप हाउसिंग, वाणिज्यिक परिसरों या बड़े आवासीय प्रोजेक्टों के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया था।

इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई थी, जिसका निस्तारण 30 अप्रैल 2024 को हुआ। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया और राज्य सरकार को आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय से स्पष्टीकरण लेने की स्वतंत्रता दी थी।
इसके बावजूद हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण (HRDA) ने अपनी 83वीं बोर्ड बैठक में बड़े पैमाने पर कृषि भूमि को निर्माण प्रयोजनों के लिए गैर-कृषि भूमि में परिवर्तित करने की स्वीकृति दे दी। विशेष रूप से हरिद्वार जनपद के ग्राम नूरपुर पंजनहेड़ी और जियापोता में इस प्रकार की स्वीकृतियां प्रदान की गईं। बताया गया कि यह स्वीकृति जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) तथा HRDA के अधिवक्ता द्वारा दिए गए कथित विधिक परामर्श के आधार पर दी गई, जिसमें कहा गया था कि उच्च न्यायालय द्वारा भू-उपयोग परिवर्तन पर कोई स्थगन नहीं है, इसलिए परिवर्तन किया जा सकता है। इसी आधार पर बड़े पैमाने पर कृषि भूमि का भू-उपयोग परिवर्तन कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान माननीय उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसकी अध्यक्षता माननीय मुख्य न्यायाधीश कर रहे थे, ने संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि विकास प्राधिकरण द्वारा इस प्रकार का भूमि उपयोग परिवर्तन उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों के प्रतिकूल है और यह न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है।
माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि 19 जून 2018 के आदेश के विपरीत भविष्य में किसी भी प्रकार का भूमि उपयोग परिवर्तन तत्काल प्रभाव से स्थगित रहेगा। साथ ही राज्य सरकार और विकास प्राधिकरण को HRDA की 83वीं बोर्ड बैठक में दी गई स्वीकृतियों के संबंध में एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण प्राप्त कर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विधिक राय की आड़ में न्यायालय के आदेशों की अनदेखी किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।

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