ईश्वर स्वयं को संत के माध्यम से अपनी पूर्ण महिमा, असीम शक्ति, ज्ञान और आनंद के साथ प्रकट करते हैं: श्री श्री महंत सत्यगिरी जी महाराज

ईश्वर स्वयं को संत के माध्यम से अपनी पूर्ण महिमा, असीम शक्ति, ज्ञान और आनंद के साथ प्रकट करते हैं।

कमल शर्मा (हरिहर समाचार)

हरिद्वार 9 फरवरी 2026, आज अपनी धर्मिक यात्रा से लौटे आवाहन अखाड़े के महामंत्री श्री श्री महंत सत्यगिरी जी महाराज से भेंट करने का सुअवसर मिला l अपनी यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए महाराज श्री ने धार्मिक यात्रा का महत्व बताते हुए कहा कि धार्मिक यात्रा या तीर्थयात्रा आध्यात्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और आस्था को सुदृढ़ करने का एक माध्यम है। यह सांसारिक तनाव से मुक्ति दिलाकर सकारात्मक ऊर्जा, सांस्कृतिक ज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। ऐसे पवित्र स्थल, जैसे, उज्जैन वाराणसी, लोगों को उनके धार्मिक विश्वासों से जोड़ते हैं। धार्मिक यात्रा केवल एक बाहरी भ्रमण नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने और स्वयं को जानने का एक आंतरिक सफर है।

  • आध्यात्मिक शुद्धि और मोक्ष: शास्त्रों के अनुसार, तीर्थ यात्रा से पापों का नाश होता है और आत्मा की शुद्धि होती है, जो मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाती है।
  • मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा: तीर्थ और मंदिर सकारात्मक ऊर्जा के केंद्र होते हैं। यहाँ की यात्रा से दैनिक जीवन का मानसिक तनाव दूर होता है और मन प्रसन्न रहता है।
  • स्वास्थ्य लाभ: कई तीर्थ स्थल प्राकृतिक वातावरण में स्थित हैं। सीढ़ियां चढ़ना या भजन-कीर्तन में ताली बजाना जैसे शारीरिक क्रियाकलाप भी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।
  • सामाजिक सौहार्द: अलग-अलग पृष्ठभूमियों के लोग साझा आध्यात्मिक अनुभव के लिए एक साथ आते हैं, जो एकता और सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देता है।

आगे संतो की महिमा बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि संत तीर्थयात्रियों के लिए ईश्वर के तीर्थस्थल तक पहुँचने की सीढ़ी हैं। जहाँ भी संत और ऋषि एक पल के लिए भी निवास करते हैं, वहीं से वाराणसी, प्रयाग और वृंदावन जैसे पवित्र स्थान बन जाते हैं। संत धरती पर एक आशीर्वाद हैं।

साधु स्वभाव से निरासक्त (निरास) होते हैं — ना उन्हें भोगो की लालसा होती है, ना संग्रह का अभिमान। साधु का जीवन तीन बातों पर टिका होता है — – भगवान की सेवा – नाम जप – मंत्र जप वे कम बोलते हैं, गंभीर रहते हैं, और अपने आचरण से लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाते हैं। साधु दिखावे में नहीं, साधना में विश्वास रखते हैं।

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