कमल शर्मा (हरिहर समाचार)
हरिद्वार। रानी गली, अमेरिकन आश्रम के सामने स्थित श्री ज्ञान गंगा गौ सेवा ट्रस्ट में संत महापुरुषों का विशाल समागम आध्यात्मिक गरिमा और श्रद्धा के वातावरण में संपन्न हुआ। आश्रम के परमाध्यक्ष, प्रातः स्मरणीय गुरु मूर्ति स्वामी ज्ञान स्वरूपानन्द अक्रिय महाराज के पावन सानिध्य में ट्रस्ट का शुभारंभ, शुद्धिकरण एवं संत महापुरुषों का पदार्पण कार्यक्रम विधिवत आयोजित किया गया।
अपने उद्बोधन में स्वामी ज्ञान स्वरूपानन्द अक्रिय महाराज ने कहा कि इस सृष्टि में मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अमूल्य है। यही वह अवस्था है, जहाँ आत्मा अपने कर्मों के माध्यम से स्वयं को ऊँचा उठा सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी निधि है—गाय माता की सेवा, संत महापुरुषों की वंदना, धर्म–कर्म का पालन, पुरुषार्थ का आचरण, दरिद्र नारायण की सहायता और सनातन संस्कृति के उत्थान में योगदान। यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का दिव्य मार्ग है।

इस अवसर पर प्रातः स्मरणीय स्वामी अलकानन्द अक्रिय महाराज ने कहा कि जिस समाज में गौ सेवा का भाव होता है, वहाँ प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना स्वतः विकसित होती है। गाय मातृत्व, सहनशीलता और करुणा की प्रतीक हैं, और उनकी सेवा से मन में दया, त्याग और संतोष के संस्कार जागृत होते हैं।
स्वामी कमलेशानन्द सरस्वती महाराज ने संत सेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संत महापुरुष अपने तप, त्याग और साधना से समाज को दिशा देते हैं। उनके श्रीमुख से निकली वाणी जीवन को परिवर्तित करने वाली अमृतधारा होती है, जो अज्ञान और अहंकार का नाश कर सत्य के प्रकाश का मार्ग दिखाती है।
परम पूज्य स्वामी सत्यव्रतानंद महाराज ने कहा कि धर्म, कर्म और पुरुषार्थ जीवन के चार स्तंभ हैं। धर्म कर्तव्य का बोध कराता है, कर्म सक्रियता देता है और पुरुषार्थ लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
महंत सूरज दास महाराज ने कहा कि बिना पुरुषार्थ के जीवन निष्क्रिय और बिना धर्म के दिशाहीन हो जाता है। दरिद्र नारायण सेवा ही सनातन संस्कृति का हृदय है। प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास मानकर जब हम पीड़ित और असहाय की सहायता करते हैं, तभी सच्ची ईश्वर आराधना होती है।
महंत स्वामी प्रेमानंद महाराज ने कहा कि भूखे को भोजन, प्यासे को जल, निराश को आशा और दुखी को सांत्वना देना ही सच्चा यज्ञ है। सनातन संस्कृति अनादि काल से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती आई है, जो संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
बाबा हठ योगी महाराज ने कहा कि संतों के श्रीमुख से बहने वाली ज्ञान की गंगा अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है। भौतिक संपत्ति क्षणभंगुर है, परंतु धर्म और सेवा से अर्जित पुण्य शाश्वत है।
स्वामी चंद्रभूषणानंद महाराज ने कहा कि सनातन सर्वोपरि है, क्योंकि यह आत्मा की शुद्धि और परम सत्य की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। जो मनुष्य गौ सेवा, संत वंदना, धर्म पालन, पुरुषार्थ और समाज सेवा को अपने जीवन का आधार बना लेता है, उसका जीवन सफल और समाज के लिए आदर्श बन जाता है।
कार्यक्रम में कोतवाल कमल मुनि श्याम गिरी महाराज सहित हरिद्वार के अनेक मठ, मंदिर और आश्रमों से पधारे संत महापुरुषों ने प्रसाद ग्रहण किया तथा अपने ज्ञान की अमृत वर्षा से वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत कर दिया।
यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि सनातन संस्कृति, सेवा, करुणा और धर्म जागरण का सशक्त संदेश भी बनकर उभरा।
