कमल शर्मा (हरिहर समाचार)
हरिद्वार। Haridwar में प्रस्तावित Kumbh Mela 2027 की तैयारियां इन दिनों जोर-शोर से चल रही हैं। घाटों का सौंदर्यीकरण, नई सड़कें और सुविधाओं का विस्तार—सब कुछ तेजी से हो रहा है। लेकिन इस विकास की चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी सामने आ रही है, जो हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख देती है।
प्रेमनगर घाट की पटरी, जहां रोजाना बुजुर्ग, महिलाएं और युवा ताजी हवा और सुकून की तलाश में टहलने आते थे, आज धूल और मिट्टी का मैदान बन चुकी है। हाल ही में लगाए गए नाजुक पौधे और छोटे पेड़, जिन्हें भविष्य की हरियाली का सपना समझकर रोपा गया था, उन्हें जड़ से उखाड़कर फेंका जा रहा है। कई स्थानों पर पेड़ों की कटाई भी की गई है, ताकि घाट निर्माण और चौड़ीकरण का काम तेजी से आगे बढ़ सके।
वह जगह, जो कभी ऑक्सीजन और शुद्ध हवा का स्रोत थी, अब प्रदूषण और मशीनों के शोर में तब्दील हो चुकी है। सबसे ज्यादा असर उन बुजुर्गों और सीनियर सिटीज़न्स पर पड़ा है, जो रोजाना यहां टहलने आते थे, इस उम्मीद के साथ कि उन्हें स्वच्छ हवा मिलेगी। अब वही लोग धूल फांकने को मजबूर हैं।
प्रशासन एक ओर “एक पेड़—एक जीवन” का संदेश देता है, तो दूसरी ओर हजारों पौधों और पेड़ों को एक झटके में खत्म किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या यही विकास है? क्या सौंदर्यीकरण का मतलब प्रकृति को खत्म करना है?
यह सिर्फ पेड़ों का नुकसान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांसों पर चोट है। अगर आज हरियाली को यूं ही उजाड़ा गया, तो कल ताजी हवा सिर्फ एक सपना बनकर रह जाएगी।
अपील:
मेला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से निवेदन है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखें। घाट बनाना जरूरी है, लेकिन हरियाली को खत्म करके नहीं। पेड़ों को बचाने, स्थानांतरित करने और नए पौधों के संरक्षण की ठोस व्यवस्था की जाए।
क्योंकि…
“पेड़ कटेंगे तो कुंभ तो होगा, लेकिन सांसें नहीं बचेंगी!” 🌱
“कुंभ 2027 की तैयारियों में हरियाली का कत्ल! विकास की आड़ में छीनी जा रही सांसें”
